बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

प्यार के प्रस्ताव करने का कोई समय या दिन नहीं होता

वेलेन्टाइन डे एक ऐसा दिन है जिस दिन प्रेमी /प्रेमिका एक दूसरे से अपने प्यार का इजहार करते हैं. वैसे प्यार के प्रस्ताव करने का कोई समय या दिन नहीं होता और आप जब चाहें कभी भी प्रेम का प्रस्ताव अपने प्रेमी /प्रेमिका के सम्मूख रख सकते हैं पर इस दिन की कुछ अलग ही बात है। ये दिन संत वेलेन्टाइन के नाम पर मनाया जाता है. इस दिन प्रेमी प्रेमिकाओं के बीच उपहार और ग्रीटिंग कार्ड्स का आदान प्रदान के साथ लाल गुलाब के फूल प्रेमी/प्रेमिका को दिये जाने का प्रचलन है लाल गुलाब प्रेम का प्रतिक माना गया हैं .
यह पर्व इंग्लैण्ड में सन् 1400 से 14 फरवरी को मनाया जाना प्रारम्भ हुआ, प्राचीन काल में इस दिन युवा प्रेमी अपने प्यार का इजहार पत्रों या संदेशों के माध्यम से अपनी प्रेमिका से करते थे. सभी प्रकार के राजनैतिक सामाजिक, जाति और धार्मिक बंधनों से मुक्त बड़े युवा तथा बच्चे सभी इसे बड़े प्रेम से मनाते हैं. युवा प्रेमी रंग, जाति, धर्म नहीं देखते बस दोस्ती प्रेम करने में विश्वास करती है. ‘वेलेन्टाइन डे’ केवल प्यार करने वाले ही नहीं मनाते बल्कि मित्रों में भी यह पर्व काफी लोकप्रिय हो रहा है. शादी-शुदा लोग भी इसे बड़े चाव से मनाने लगे हैं । पहले तो केवल पुरुष ही अपनी वेलेन्टाइन या प्रेमिका को संदेश और कार्ड भेजते थे आज युवतियां भी अपने प्रेमियों को मोहब्बत भरे कार्ड और उपहार भेजकर प्रेम का प्रस्ताव रखने लगी है।
प्रेम एक दिव्य, अलौकिक एवं वंदनीय तथा प्रफुल्लता देने वाली स्थिति है। प्रेम मनुष्य में करूणा , दुलार और स्नेह की अनुभूति देता है। ग्रहों के कारण मनुष्य प्रेम करता है और इन्हीं ग्रहों के प्रभाव से प्रेमी का दिल भी टूटता हैं। ज्योतिष शास्त्रों में प्रेम के योगों के बारे में स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है, परन्तु जीवनसाथी के बारे में अपने से उच्च या निम्न का विस्तृत विवरण है। कोई भी स्त्री-पुरूष अपने उच्च या निम्न कुल में तभी विवाह करेगा जब वे दोनों प्रेम करते होंगे। आज की भौतिकवादी युवा पीढ़ी अधिकतर प्रेम-विवाह की ओर आकर्षित हो रही है। कई बार प्रेम एक-दूसरे की देखी या फैशन के तौर पर भी होता है, किंतु जीवनपर्यंत निभ नहीं पाता। ग्रह अनुकूल नहीं होन के कारण ऐसी स्थिति बनती है। शास्त्रों मे प्रेम विवाह को गांधर्व विवाह के नाम से जाना गया है। किसी युवक-युवती के मध्य प्रेम की जो भावना पैदा होती है, वह सब उनके ग्रहों का प्रभाव ही होता है, जो कमाल दिखाती है। ग्रह हमारी मनोदशा, पसंद-नापसंद और रूचियों को वय करते और बदलते है। वर्तमान में प्रेम विवाह गंधर्व विवाह का ही परिवर्तित रूप है।
यदि प्रेम हो जाता है तो उसकी सफलता पंचमेश, सप्तमेश और लग्नेश, द्वादेश गृह के संबंधों पर निर्भर करती है। प्रेम के लिए तीसरे भाव का स्वामी का उच्च या बलवान होना बहुत ही आवश्यक है। यही जातक को हिम्मत प्रदान करता है पंचम भाव का स्वामी और सप्तम भाव का स्वामी एक साथ बैठा हो या दृष्टि संबंध हो रहा हो तो प्रेम निश्चित होता है। पंचम भाव प्रेम भावना का स्थान है तथा सप्तम भाव विवाह का स्थान होता है। प्रेम के लिए मंगल-शनि, मंगल-शुक्र, चंद्र-शुक्र की युक्ति भी इस योग को बढ़ावा देती है और योग बनाती है।
प्रेम के लिए जन्मकुण्डली के बारहवें भाव को भी देखें क्योंकि विवाह के लिए बारहवाँ भाव भी देखा जाता है। यह भाव शय्या सुख (स्त्री सुख) का भी है। इन भावों के साथ-साथ उन (एक, पाँच, सात) भावों के स्वामियों की स्थिति का पता करना होता है। यदि इन भावों के स्वामियों का संबंध किसी भी रूप में अन्य भावों से बन रहा हो तो निश्चित रूप से जातक प्रेम करता है।
1. लेग्नेश का पंचम से संबंध हो और जन्मपत्रिका में पंचमेश-सप्तमेश का किसी भी रूप मे संबंध हो। शुक्र, मंगल की युति, शुक्र की राशि में स्थिति और लग्न त्रिकोण का संबंध प्रेम संबंधो का सूचक है। पंचम या सप्तक भाव में शुक्र सप्तमेश या पंचमेश के साथ हो।
2. किसी की जन्मपत्रिका में लग्न, पंचम, सप्तम भाव व इनके स्वामियों और शुक्र तथा चन्द्रमा जातक के वैवाहिक जीवन व प्रेम संबंधों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। लग्न या लग्नेश का सप्तम और सप्तमेश का पंचम भाव व पंचमेश से किसी भी रूप में संबंध प्रेम संबंध की सूचना देता है। यह संबंध सफल होगा अथवा नहीं, इसकी सूचना ग्रह योगों की शुभ-अशुभ स्थिति देती है।
3. पंचम में मंगल भी प्रेम विवाह करवाता हैं। यदि राहु पंचम या सप्तम में हो तो प्रेम विवाह की संभावना होती हैं। सप्तम भाव में यदि मेष राशि में मंगल हो तो प्रेम विवाह होता हैं, सप्तमेश और पंचमेश एक-दूसरे के नक्षत्र पर हों तो भी प्रेम विवाह का योग बनता हैं।
4. पंचमेश तथा सप्तमेश कहीं भी, किसी भी तरह से द्वादशेश से संबंध बनायें लग्नेश या सप्तमेश का आपस में स्थान परिवर्तन अथवा आपस में युक्त होना अथवा दृष्टि संबंधं।
5 जैमिनी सूत्रानुसार दारा कारक और पुत्र कारक की युति भी प्रेम विवाह कराती है। पंचमेश और दाराकारक का संबंध भी प्रेम विाह करवाता है।
6 शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबंधों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि किसी जातक की कुण्डली में सभी अनुकूल स्थितियाँ होते हुई भी, शुक्र की स्थिति प्रतिकूल हो तो प्रेम संबंध बनना मुशकिल है।
7. सप्तम भाव या सप्तमेश का पाप पीड़ित होना, पापयोग में होना प्रेम विवाह की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। पंचमेश व सप्तमेश दोनों की स्थिति इस प्रकार हो कि उनका सप्तम-पंचम से कोई संबंध न हो तो प्रेम की असफलता दृष्टिगत होती है।
8. शुक्र का सूर्य के नक्षत्र में होना और उस पर चन्द्रमा का प्रभाव होने की स्थिति में प्रेम संबंध होने के उपरांत या परिस्थितिवश विवाह व प्रेेम सम्बन्ध हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना असफल प्रेम का कारण है।
9 पंचम व सप्तम भाव के स्वामी ग्रह यदि धीमी गति के ग्रह हों तो प्रेम संबंधों का योग होने या चिरस्थायी प्रेम की अनुभूति को दर्शाता है। इस प्रकार के जातक जीवनभर प्रेम प्रसंगों को नहीं भूलते चाहे वे सफल हों या असफल।
10 पुरूष की कुंडली है, तो शुक्र व स्त्री की कुंडली है, तो गुरू विवाह व प्रेम का कारक माना गया है। इसलिए सप्तमेश, शुक्र या गुरू अस्त, नीच या बलहीन हो तो विवाह व प्रेम के योग नहीं बन पाते। बनते भी हैं, तो शादी होने के बाद भी वैवाहिक जीवन में अभाव रहता है।
11 लग्नेश अस्त हो, सूर्य दूसरे स्थान में और शनि बारहवें स्थान में हो तो विवाह सुख में अल्पता दर्शात है।
12 पंचम स्थान पर मंगल, सूर्य, राहु, शनि जैसे एक से अधिक पापी ग्रहों की दृष्टि विवाह व प्रेम सुख में कमी लाती है।
13 शुक्र और चंद्र, शुक्र और सूर्य की युति सप्तम स्थान में हो व मंगल शनि की युति लग्न में हो, तो प्रेम/विवाह का सुख प्राप्त नहीं होता।
14 अष्टम स्थान में बुध-शनि की युति वाले पुरूष, विवाह सुख नहीं पाते या होता भी है, अल्प होता है।
15 पंचम स्थान में मंगल, लाभ स्थान में शनि तथा पापकर्तरी में शुक्र होने से प्रेम व विवाह सुख में अल्पता आती है।
16 राहु पंचम भाव में विराजमान हो पंचम व सप्तमेश की युति प्रेम कि क्रियाओं में बाधक होता है।
ग्रहों के योगों से स्पष्ट है कि यदि आपकी जन्म कुण्डली में ग्रहों कि प्रेम सम्बन्धित स्थितियां अनुकूल नहीं है तो आपको प्रेम प्रस्ताव प्रेमिका के सम्मुख रखना मंहगा भी पड सकता है।
मूंलाक 1 के जातकों के लिए अंक 4 व 8 मित्र अंक हैं तथा सम अंक 2, 3, 7, 9 हैं इन्हें प्रेम प्रस्ताव रख सकते हैं परन्तु अंक 1 के शत्रु 5 व 6 है इस मूंलाक के जातकों के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव न रखें।
मूलांक2 के जातकों के लिए मित्र अंक 7, सम अंक 1, 3, 4, 6 है इन्हें प्रेम प्रस्ताव रख सकते हैं शत्रु अंक 5 व 8 हैं इन्हें प्रेम प्रस्ताव न रखें।
मूलांक 3 के जातकों के लिए मित्र अंक 6, 9 सम अंक 1, 2, 5, 7 हैं इन्हें प्रेम प्रस्ताव रख सकते हैं। शत्रु अंक 4 व 8 हैं।
मूंलाक 4 के जातकों के लिए मित्र अंक 1, 8 व सम अंक 2, 6, 7, 9 है इन्हें प्रेम प्रस्ताव रख सकते हें तथा अंक 3 व 5 अंक शत्रु हैं इन्हों के सम्मुख प्रस्ताव न रखें।
मूंलाक 5 के जातकों के लिये मित्र अंक 3, 9, सम अंक 1, 6, 7, 8 वालों को प्रेम प्रस्ताव रख सकते हैं शत्रु अंक 2 व 4 है इन मूंलाक वालों के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव न रखें।
मूंलाक 6 के जातकों के लिये मित्र अंक 3, 9 सम अंक 2, 4, 5, 6 वालों को प्रेम प्रस्ताव रख सकते हैं परन्तु 1 और 8 अकों के मूंलाक वालों के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव न रखें।
मूंलाक 7 के जातकों के लिये मित्र अंक 2, 6 तथा सम अंक 3, 4, 5, 8 वालों के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव रख सकते हैं परन्तु शत्रु अंक 1 और 9 के मूंलाक वालों के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव न रखें।
मूंलाक 8 के जातकों के लिये मित्र अंक 1, 4 सम अंक 2, 5, 7, 9 के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव रख सकते हैं परन्तु शत्रु अंक 3, 6 के मूंलाक वालों के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव न रखें।
मूंलाक 9 के जातकों के लिये मित्र अंक 3, 6 हैं सम अंक 2, 4, 5, 8 हैं इन अंकों के जातकों के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव रख सकते हैं परन्तु शत्रु अंक 1 और 7 अकों वालों के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव न रखें।

3 टिप्‍पणियां:

  1. santosh pusadkar आप ने जो बताया सही है. आप को धन्यवाद करता हू.शुक्र की महादशा १३ ऑक्ट २००९ सुरु हो गायी है.कन्या लग्न कुंडली है. केतू दिव्तीय मै , शनी तृतीय ,गुरु पंचम बुध शुक्र.चंद्र सप्तम मै , रवी राहू अष्टम मै. मंगल नअवं मै है कोनसा रतन पाहणा पडेगा . कृपया मागदर्शन करे.

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  2. santosh pusadkar आप ने जो बताया सही है. आप को धन्यवाद करता हू.शुक्र की महादशा १३ ऑक्ट २००९ सुरु हो गायी है.कन्या लग्न कुंडली है. केतू दिव्तीय मै , शनी तृतीय ,गुरु पंचम बुध शुक्र.चंद्र सप्तम मै , रवी राहू अष्टम मै. मंगल नअवं मै है कोनसा रतन पाहणा पडेगा . कृपया मागदर्शन करे.

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