गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

दीपावली पूजन कैसे करें----1

दीपावली पूजन कैसे करें----
कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की कार्तिक अमास्या, दिन बुधवार, चित्रा नक्षत्रकालीन में वर्ष 2011 की दीपावली का पूजन किया जाएगा. बुधवार की रात्रि को 18-46 से 2042 तक वृष लग्न तथा सिह लग्न मे श्री महालक्ष्मी का पूजन व दीपावली का शुभ पर्व इस दिन प्रदोष काल से मध्य रात्रि तक श्री लक्ष्मी नारायण का पूजन, कुबेर पूजन, दीप पूजन कर घर में दीप जलाकर मंत्र -जप, तप, ध्यान आदि कार्य कर्ने से अनेक गुणा पुन्यफल प्राप्त होते है.

प्रातः स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अब निम्न संकल्प से दिनभर उपवास रहें- मम सर्वापच्छांतिपूर्वकदीर्घायुष्यबलपुष्टिनैरुज्यादि- सकलशुभफल प्राप्त्यर्थं गजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकलसम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्ध्‌यर्थं इंद्रकुबेरसहितश्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये। संध्या के समय पुनः स्नान करें। लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारी में घर की सफाई करके दीवार को चूने अथवा गेरू से पोतकर लक्ष्मीजी का चित्र बनाएं। (लक्ष्मीजी का छायाचित्र भी लगाया जा सकता है।)

भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन, कदली फल, पापड़ तथा अनेक प्रकार की मिठाइयाँ बनाएं। लक्ष्मीजी के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर मौली बाँधें। इस पर गणेशजी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें। फिर गणेशजी को तिलक कर पूजा करें। अब चौकी पर छः चौमुखे व 26 छोटे दीपक रखें। इनमें तेल-बत्ती डालकर जलाएं। फिर जल, मौली, चावल, फल, गुढ़, अबीर, गुलाल, धूप आदि से विधिवत पूजन करें। पूजा पहले पुरुष तथा बाद में स्त्रियां करें। पूजा के बाद एक-एक दीपक घर के कोनों में जलाकर रखें। एक छोटा तथा एक चौमुखा दीपक रखकर निम्न मंत्र से लक्ष्मीजी का पूजन करें- नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्वदर्चनात॥ इस मंत्र से इंद्र का ध्यान करें- ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबलः। शतयज्ञाधिपो देवस्तमा इंद्राय ते नमः॥ इस मंत्र से कुबेर का ध्यान करें- धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भवंतु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पदः॥ इस पूजन के पश्चात तिजोरी में गणेशजी तथा लक्ष्मीजी की मूर्ति रखकर विधिवत पूजा करें। तत्पश्चात इच्छानुसार घर की बहू-बेटियों को आशीष और उपहार दें। लक्ष्मी पूजन रात के बारह बजे करने का विशेष महत्व है। इसके लिए एक पाट पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर एक जोड़ी लक्ष्मी तथा गणेशजी की मूर्ति रखें। समीप ही एक सौ एक रुपए, सवा सेर चावल, गुढ़, चार केले, मूली, हरी ग्वार की फली तथा पाँच लड्डू रखकर लक्ष्मी-गणेश का पूजन करें। उन्हें लड्डुओं से भोग लगाएँ। दीपकों का काजल सभी स्त्री-पुरुष आँखों में लगाएं। फिर रात्रि जागरण कर गोपाल सहस्रनाम पाठ करें। इस दिन घर में बिल्ली आए तो उसे भगाएँ नहीं। बड़े-बुजुर्गों के चरणों की वंदना करें। व्यावसायिक प्रतिष्ठान, गद्दी की भी विधिपूर्वक पूजा करें। रात को बारह बजे दीपावली पूजन के उपरान्त चूने या गेरू में रुई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिल्ल, लोढ़ा तथा छाज (सूप) पर कंकू से तिलक करें। (हालांकि आजकल घरों मे ये सभी चीजें मौजूद नहीं है लेकिन भारत के गाँवों में और छोटे कस्बों में आज भी इन सभी चीजों का विशेष महत्व है क्योंकि जीवन और भोजन का आधार ये ही हैं) दूसरे दिन प्रातःकाल चार बजे उठकर पुराने छाज में कूड़ा रखकर उसे दूर फेंकने के लिए ले जाते समय कहें 'लक्ष्मी-लक्ष्मी आओ, दरिद्र-दरिद्र जाओ'। लक्ष्मी पूजन के बाद अपने घर के तुलसी के गमले में, पौधों के गमलों में घर के आसपास मौजूद पेड़ के पास दीपक रखें और अपने पड़ोसियों के घर भी दीपक रखकर आएं।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

करवा चौथः 15 अक्तूबर, 2011

करवा चौथः 15 अक्तूबर, 2011
विवाहित स्त्रियों के लिए यह व्रत अखंड सौभाग्य का कारक होता है। करवा चौथः हिन्दु पंचांग अनुसार प्र.29 आश्विन, सं. 2068, दिन शनिवार कार्तिक पक्ष-14, डेट --15-10-2011 को करक चतुर्थी अर्थात करवा चौथ है! इस दिन चंद्रोदय शाम 7: 44 शाम [19:44] पर होगा! यह कार्तिक कृष्णा चतुर्थी/कारक चतुर्थी/करवा चौथ के रूप में मनाते हैं।
आप सभी जानते हैं कि करवाचौथ का पर्व मूल रूप से पति-पत्नी के बीच रिश्तों को और मजबूत करने का दिन होता है। खासकर जो नए जोड़े होते हैं, उनके लिए यह पर्व और भी मायने रखता है। एक-दूसरे को करीब से जानने और समझने का इससे बेहतर अवसर और क्या हो सकता है! लेकिन कुछ सालों से इसका स्वरूप काफी बदल गया है।
करवा चैथ व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्थी को किया जाता है। विवाहित स्त्रियों के लिए यह व्रत अखंड सौभाग्य का कारक होता है। विवाहित स्त्रियां इस दिन अपने प्राण बल्लभ की दीर्घायु एवं स्वास्थ्य की कामना करके भगवान रजनीश (चंद्रमा) को अघ्र्य अर्पित कर व्रत को पूर्ण करती हैं। इस व्रत में रात्रि बेला में शिव, पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश और चंद्रमा के चित्रों एवं सुहाग की वस्तुओं की पूजा का विधान है। इस दिन निर्जल व्रत रखकर चंद्र दर्शन और चंद्रमा को अघ्र्य अर्पण कर भोजन ग्रहण करना चाहिए। पीली मिट्टी की गौरी भी बनायी जाती है। कुछ स्त्रियां परस्पर चीनी या मिट्टी का करवा आदान प्रदान करती हैं। लोकाचार में कई स्त्रियां काली चिकनी मिट्टी के कच्चे करवे में चीनी की चासनी बनाकर डाल देती हैं अथवा आटे को घी में सेंककर चीनी मिलाकर लड्डू आदि बनाती हैं। पूरी-पुआ और विभिन्न प्रकार के पकवान भी इस दिन बनाए जाते हैं। नव विवाहिताएं विवाह के पहले वर्ष से ही यह व्रत प्रारंभ करती हैं। चैथ का व्रत चैथ से ही प्रारंभ कराया जाता है। इसके बाद ही अन्य महीनों के व्रत करने की परम्परा है।
नैवेद्य (भोग) में से कुछ पकवान ब्राह्मणों को दक्षिणा सहित दान करें तथा अपनी सासू मां को 13 लड्डू, एक लोटा, एक वस्त्र, कुछ पैसे रखकर एक करवा चरण छूकर दे दें। शेखावाटी (राजस्थान) में एक विशेष परम्परा है। वहां स्त्रियां कुम्हारों के यहां से करवा लाकर गेहूं या बाजरा भूनकर सथिया करके आटे की बनी हुई 13 मीठी टिक्कियां, एक गुड़ की डली और चार आने के पैसे या श्रद्धानुसार विवाह के साल टीका चावल लगाकर गेहूं के 13 दाने हाथ में लेकर कहानी सुनती हैं। करवा तथा पानी का लोटा रोली पाटे पर रखती हैं और कहानी सुनकर करवा अपनी सास के पैरों में अर्पित करती हैं। सास न हो तो मंदिर में चढ़ाती हैं।
उद्यापन करें तो 13 सुहागिन स्त्रियों को जिमावें। 13 करवा करें 13 जगह सीरा पूड़ी रखकर हाथ फेरें। सभी पर रुपया भी रखें। बायना जीमने वाली स्त्रियों को परोस दें। रुपया अपनी सास को दे दें। 13 करवा 13 सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराने के बीच दे दें।
करवा चैथ का व्रत भारतीय संस्कृति के उस पवित्र बंधन या प्यार का प्रतीक है जो पति पत्नी के बीच होता है। भारतीय संस्कृति में पति को परमेश्वर माना गया है। यह व्रत पति पत्नी दोनों के लिए नव प्रणय निवेदन और एक दूसरे के प्रति हर्ष, प्रसन्नता, अपार प्रेम, त्याग एवं उत्सर्ग की चेतना लेकर आता है। इस दिन स्त्रियां नव वधू की भांति पूर्ण शृंगार कर सुहागिन के स्वरूप में रमण करती हुई भगवान रजनीश से अपने अखंड सुहाग की प्रार्थना करती हैं।
स्त्रियां शृंगार करके ईश्वर के समक्ष व्रत के बाद यह प्रण भी करती हैं कि वे मन, वचन एवं कर्म से पति के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना रखेंगी तथा धर्म के मार्ग का अनुसरण करती हुई धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करेंगी।
कुंआरी कन्याएं इस दिन गौरा देवी का पूजन करती हैं। शिव पार्वती के पूजन का विधान इसलिए भी है कि जिस प्रकार शैलपुत्री पार्वती ने घोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया वैसा ही सौभाग्य उन्हें भी प्राप्त हो। इस संदर्भ में एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार पांडवों के बनवास के समय जब अर्जुन तप करने इंद्रनील पर्वत की ओर चले गए तो बहुत दिनों तक उनके वापस न लौटने पर द्रौपदी को चिंता हुई। श्रीकृष्ण ने आकर द्रौपदी की चिंता दूर करते हुए करवा चैथ का व्रत बताया तथा इस संबंध में जो कथा शिवजी ने पार्वती को सुनाई थी, वह भी सुनाई। कथा इस प्रकार है।
इंद्रप्रस्थ नगरी में वेद शर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण के सात पुत्र तथा एक पुत्री थी जिसका नाम वीरावती था। उसका विवाह सुदर्शन नामक एक ब्राह्मण के साथ हुआ। ब्राह्मण के सभी पुत्र विवाहित थे। एक बार करवा चैथ के व्रत के समय वीरावती की भाभियों ने तो पूर्ण विधि से व्रत किया, किंतु वीरावती सारा दिन निर्जल रहकर भूख न सह सकी तथा निढाल होकर बैठ गई। भाइयों की चिंता पर भाभियों ने बताया कि वीरावती भूख से पीड़ित है। करवा चैथ का व्रत चंद्रमा देखकर ही खोलेगी। यह सुनकर भाइयों ने बाहर खेतों में जाकर आग जलाई तथा ऊपर कपड़ा तानकर चंद्रमा जैसा दृश्य बना दिया और जाकर बहन से कहा कि चांद निकल आया है, अघ्र्य दे दो। यह सुनकर वीरावती ने अघ्र्य देकर खाना खा लिया। नकली चंद्रमा को अघ्र्य देने से उसका व्रत खंडित हो गया तथा उसका पति अचानक बीमार पड़ गया। वह ठीक न हो सका। एक बार इंद्र की पत्नी इंद्राणी करवा चैथ का व्रत करने पृथ्वी पर आईं। इसका पता लगने पर वीरावती ने जाकर इंद्राणी से प्रार्थना की कि उसके पति के ठीक होने का उपाय बताएं। इंद्राणी ने कहा कि तेरे पति की यह दशा तेरी ओर से रखे गए करवा चैथ व्रत के खंडित हो जाने के कारण हुई है। यदि तू करवा चैथ का व्रत पूर्ण विधि-विधान से बिना खंडित किए करेगी तो तेरा पति ठीक हो जाएगा। वीरावती ने करवा चैथ का व्रत पूर्ण विधि से संपन्न किया जिसके फलस्वरूप उसका पति बिलकुल ठीक हो गया। करवा चैथ का व्रत उसी समय से प्रचलित है।
अतः सौभाग्य, पुत्र-पौत्रादि और धन-धान्य के इच्छुक स्त्रियों को यह व्रत विधि पूर्वक करना चाहिए और इस दिन विभिन्न प्रकार के बधावे गाने चाहिए।
प० राजेश कुमार शर्मा भृगु ज्योतिष अनुसन्धान केन्द्र सदर गजं बाजार मेरठ कैन्ट 09359109683

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

अपराजिता' श्री दुर्गादेवीका मारक रूप है । पूजन करनेसे देवीका यह रूप पृथ्वीतत्त्वके आधारसे भूगर्भसे प्रकट होकर, पृथ्वीके जीवोंके लिए कार्य करता है

दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन " दश" व "हरा" से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप में राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं-
शारदीय नवरात्र को ब्रह्मेत्सवम् के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन नौ दिनों के दौरान सात पर्वतों के राजा पृथक-पृथक बारह वाहनों की सवारी करते हैं तथा हर दिन एक नया अवतार लेते हैं।
अपराजितादेवीका पूजन
पूजास्थलपर अष्टदलकी आकृति बनाते हैं ।
इस अष्टदलका मध्यबिंदु `भूगर्भबिंदु' अर्थात देवीके `अपराजिता' रूपकी उत्पत्तिबिंदु का प्रतीक है, तथा अष्टदलके आठबिंदु, अष्टपाल देवताओंका प्रतीक है ।
इस अष्टदलके मध्यबिंदुपर `अपराजिता' देवीकी मूर्तिकी स्थापना कर उसका पूजन करते हैं ।
'अपराजिता' श्री दुर्गादेवीका मारक रूप है । पूजन करनेसे देवीका यह रूप पृथ्वीतत्त्वके आधारसे भूगर्भसे प्रकट होकर, पृथ्वीके जीवोंके लिए कार्य करता है । अष्टदलपर आरूढ हुआ यह त्रिशूलधारी रूप शिवके संयोगसे, दिक्पाल एवं ग्रामदेवताकी सहायतासे आसुरी शक्तियोंका नाश करता है ।
पूजनके उपरांत इस मंत्रका उच्चारण कर शत्रुनाश एवं सबके कल्याणके लिए प्रार्थना करते हैं ।
हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला ।
अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम ।।
इसका अर्थ है, गलेमें विचित्र हार एवं कमरपर जगमगाती स्वर्ण करधनी अर्थात मेखला धारण करनेवाली, भक्तोंके कल्याणके लिए सदैव तत्पर रहनेवाली, हे अपराजितादेवी ! मुझे विजयी कीजिए । कुछ स्थानोंपर अपराजितादेवीका पूजन सीमोल्लंघनके लिए जानेसे पूर्व भी करते हैं । शमीपत्र तेजका उत्तम संवर्धक है । इसलिए शमी वृक्षके निकट अपराजितादेवीका पूजन करनेसे शमीपत्रमें पूजनद्वारा प्रकट हुई शक्ति संजोई रहती है । शक्तितत्त्वसे शमीपत्रको घरमें रखनेसे इन तरंगोंका लाभ वर्षभर प्राप्त करना जीवोंके लिए संभव होता है । कुछ स्थानोंपर नवरात्रीकालमें रामलिलाका आयोजन किया जाता है । जिसमें प्रभु रामजीके जीवनपर आधारीत लोकनाट्य प्रस्तुत किया जाता है । दशहरेकी दिन तथा लोकनाट्यके अंतमें रावण एवं कंुभकर्णकी पटाखोंसे बनी बडी बडी प्रतिमाओंका दहन किया जाता है ।
दशहरेके दिन एकदूसरेको अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें क्यो देते है तथा शस्त्रपूजन के परिणाम
अपराजिता' शक्तितत्त्वकी उत्पत्ति पृथ्वीके भूगर्भबिंदु से होती है ।
अपराजिता देवीसे प्रार्थना कर देवीका आवाहन करनेपर भक्तकी प्रार्थनानुसार अष्टदलके मध्यमें स्थित भूगर्भबिंदुमें देवीतत्त्व कार्यरत होता है ।
उस समय उनके स्वागतके लिए अष्टपाल देवताओंका भी उस स्थानपर आगमन होता है । अपराजिताकी उत्पत्तिसे मारक तरंगें प्रक्षेपित होती हैं ।
अष्टपालों द्वारा अष्टदलकी आठबिंदुओंसे लालिमायुक्त प्रकाश-तरंगोंके माध्यमसे ये मारक तरंगें अष्टदिशाओंमें प्रक्षेपित होती हैं ।
सर्व आठों बिंदुओंसे शक्तिकी मारक तरंगोंका प्रक्षेपण होता है । ये तरंगें विशिष्ट कोनोंमें एकत्रित होकर, रज-तमात्मक शक्तिका नाश करती हैं । पृथ्वीपर सर्व जीव निर्विघ्न रूपसे जीवन जी सकें, इस हेतु वायुमंडलकी शुद्धि भी करती हैं । पूजनके उपरांत शमी अथवा अश्मंतक वृक्षोंके मूलके समीप की कुछ मिट्टी एवं उन वृक्षोंके पत्ते घर लाते हैं ।
दशहरेके दिन एक दूसरे को अश्मंतक के पत्ते सोनेके रूपमें देनेका कारण
विजयादशमीके दिन अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देवताको अर्पित करते हैं । आपसी प्रेमभाव निर्माण करनेके लिए अश्मंतकके पत्ते शुभचिंतकोंको सोनेके रूपमें देकर उनके कल्याणकी प्रार्थना करते हैं । तदुपरांत ज्येष्ठोंको नमस्कार कर उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं । अश्मंतकके पत्तोंमें ईश्वरीय तत्त्व आकृष्ट करनेकी क्षमता अधिक होती है । इन पत्तोंमें १० प्रतिशत रामतत्त्व एवं शिवतत्त्व भी विद्यमान होता है । ये पत्ते देनेसे पत्तोंद्वारा व्यक्तिको शिवकी शक्ति भी प्राप्त होती है । ये पत्ते व्यक्तिमें तेजतत्त्वकी सहायतासे क्षात्रवृत्तिका भी संवर्धन करते हैं।

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

नवरात्रके अवसर पर करे नौ ग्रहो के उपाय

नवरात्रके अवसर पर करे नौ ग्रहो के उपाय
सूर्य: यदि आपकी जन्म पत्रिका में सूर्य अच्छे फल नही दे रहा है, तो नवरात्र में आपको महात्रिपुरसुंछरी और कूष्माण्डा देवी की उपासना करनी होगी और मन्त्र ‘ऐं क्लीं सौः’ का जप नवरात्र में करना आपको लाभ दायक होगा। बालत्रिपुरसुन्दी तथा कूष्माण्डा देवी का विग्रह, चित्र अथवा यन्त्र रखकर उनका नित्य पूजन करें ने कृष्टो मे कमी आयेगी, मन्त्र की नित्य 9 माला करे।
चन्द्रमा: जन्मपत्रिका में यदि चन्द्रमा अच्छे फल नही दे रहा है, तो व्यक्ति को माँ लक्ष्मी और शैलपुत्री की पूजा-उपासना करनी चाहिए। इन नवरात्र में प्रथम दिन से ही दोनों देवियों के चित्र, के सामने अथवा यन्त्र को सामने रखकर सर्वप्रथम उनकी पूजा-उपासना करें। तत्पष्चात् ‘ऊँ नमः कमलवासिन्यै स्वाहा’ मन्त्र का नवरात्रपर्यन्त नित्य 9 मालाओं का जप करें।
मंगल: यदि आपकी जन्मपत्रिका में मंगल अच्छे फल नही दे रहा है, तो इन नवरात्र में स्कन्दमाता और मातंगी देवी की पूजा-उपासना करनी चाहिए। प्रथम नवरात्र से ही दोनों देवियों के विग्रह, चित्र अथवा यन्त्र को स्थापित करके उनकी पूजा-उपासना करनी चाहिए। तत्पष्चात ‘ऊँ हीं क्लीं हं मातंग्यै फट् स्वाहा’ मन्त्र की नवरात्रपर्यन्त 9 मालाओं का जप करें।
बुध: यदि जन्मपत्रिका में बुध अच्छे फल नही दे रहा है, और समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हो, तो इस नवरात्र में महातारा और ब्रह्मचारिणी देवी के विग्रह, चित्र अथवा यन्त्र को स्थापित कर नवरात्रपर्यन्त नित्य उनका पूजन अर्चन करें और ‘ऊँ हीं त्रीं हुं फट्’ मन्त्र का नवरात्रपर्यन्त नित्य 9 मालाओं का जप करें।
गुरू: यदि आपकी जन्मपत्रिका में गुरू अशुभफलकारी हो, अच्छे फल नही दे रहा है तो उसे अनुकूल बनाने के लिए नवरात्र में नित्य माँ बगलामुखी और माँ चन्द्रघण्टा के चित्र अथवा यन्त्र का पूजन करें। मन्त्र की नित्य 9 मालाओं का नवरात्र पर्यन्त जप करें।
शुक्र: यदि आपकी जन्मपत्रिका में शुक्र अशुभफलकारी हो, अच्छे फल नही दे रहा है तो उसे अनुकूल बनाने के लिए इन नवरात्रों में माँ भुवनेष्वरी और महागौरी के चित्र अथवा यन्त्र की स्थापना कर नित्य उनका पूजन-अर्चन करें और नित्य 9 मालाओं का जप करें।
शनि: यदि आपकी जन्मपत्रिका में शनि अशुभफलकारी हो, अच्छे फल नही दे रहा है तो नवरात्र में महाकाली और कालरात्रि की उपासना करना श्रेष्ठ होगा। इस हेतु इनके विग्रह, चित्र अथवा यन्त्र का नवरात्र पर्यन्त नित्य पूजन-अर्चन करें और ‘ऊँ हृौ काली महाकाली किलिकिले फट् स्वाहा’ मन्त्र की नित्य 9 मालाओं का जप करें।
राहू: यदि आपकी जन्मपत्रिका अशुभफलकारी हो, अच्छे फल नही दे रहा है और आपको पीड़ित कर रहा हो, तो उसे अनुकूल बनाने के लिए माँ छिन्नमस्ता और माँ कात्यायिनी की नित्य पूजा-उपासना करली चाहिए। इस हेतु नवरात्र में प्रथम दिन से ही पूजा स्थान में उनके विग्रह, चित्र अथवा यन्त्र की स्थापना कर नित्य उनका पूजन करें। मन्त्र की 9 मालाओं का जप नवरात्र पर्यन्त करें।
केतु: जन्मपत्रिका में केतु अशुभफलकारी हो, अच्छे फल नही दे रहा है और उसे अनुकूल बनाने के लिए नवरात्र में त्रिपुर भैरवी और सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना उनके विग्रह, चित्र अथवा यन्त्र की स्थापना कर नवरात्र पर्यन्त नित्य करनी चाहिए। साथ ही ‘हसैं हसकरीं हसैं’ मन्त्र का नवरात्र पर्यन्त नित्य 9 मालाओं का जप करना चाहिए।
शारदीय नवरात्र 28 सितम्बर से 05 अक्टूबर, 2011 तक रहेंगे। 28 सितम्बर, बुधवार के दिन हस्त नक्षत्र 13.38 तक है। तत्पश्चात चित्रा प्रारम्भ होगा, जो घटस्थापना में वर्जित माना जाता है। बुधवार होने के कारण अभिजित भी वर्जित है। इसलिए इस दिन घटस्थापना सूर्योदय के पश्चात द्विस्वभाव लग्न कन्या में ही करना श्रेष्ठ है। घटस्थापना मुहूर्त मेरठ प्रातः 06 बजकर 16 मिनट से 07 बजकर 44 तक

प० राजेश कुमार शर्मा भृगु ज्योतिष अनुसन्धान केन्द्र सदर गजं बाजार मेरठ कैन्ट 09359109683

शनिवार, 24 सितंबर 2011

नवरात्र 28 सितम्बर से 05 अक्टूबर, 2011 तक

नवरात्र 28 सितम्बर से 05 अक्टूबर, 2011 तक
शारदीय नवरात्र 28 सितम्बर से 05 अक्टूबर, 2011 तक रहेंगे। 28 सितम्बर, बुधवार के दिन हस्त नक्षत्र 13.38 तक है। तत्पश्चात चित्रा प्रारम्भ होगा, जो घटस्थापना में वर्जित माना जाता है। बुधवार होने के कारण अभिजित भी वर्जित है। इसलिए इस दिन घटस्थापना सूर्योदय के पश्चात द्विस्वभाव लग्न कन्या में ही करना श्रेष्ठ है।
इनके दर्शन मात्र से सभी अभीष्ट पूरे होते है. शक्ति के महत्व के कारण ही भारत में अनेक शक्तिपीठ हैं. शक्तिपीठों की संख्या के संबंध में भिन्न-भिन्न मत हैं, लेकिन 'तंत्रचूड़ामणि' ग्रंथ के अनुसार, ऐसे 51 शक्तिपीठ हैं. इनमें कुछ प्रमुख के नाम हैं-ज्वालामुखी, कामाख्या, त्रिपुरसुंदरी, वाराही, काली, अंबिका, भ्रामरी, ललिता आदि।
घटस्थापना मुहूर्त मेरठ प्रातः 06 बजकर 16 मिनट से 07 बजकर 44 तक
नई दिल्ली प्रातः 06 बजकर 16 मिनट से 07 बजकर 44 मिनट तक
मुंबई प्रातः 06 बजकर 32 मिनट से 07 बजकर 54 मिनट तक
कोलकाता प्रातः 05 बजकर 30 मिनट से 06 बजकर 56 मिनट तक
चेन्नाई प्रातः 06 बजकर 01 मिनट से 07 बजकर 20 मिनट तक
जयपुर प्रातः 06 बजकर 21 मिनट से 07 बजकर 48 मिनट तक
जाधपुर प्रातः 06 बजकर 32 से मिनट 07 बजकर 59 मिनट तक
चण्डीगढ़ प्रातः 06 बजकर 18 से मिनट 07 बजकर 48 मिनट तक
लखनऊ प्रातः 06 बजकर 01 से मिनट 07 बजकर 28 मिनट तक
वाराणसी प्रातः 05 बजकर 52 से मिनट 07 बजकर 18 मिनट तक
पटना प्रातः 05 बजकर 43 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तक
गुवाहाटी प्रातः 05 बजकर 17 मिनट से 06 बजकर 44 मिनट तक
भुवनेश्वर प्रातः 06 बजकर 40 मिनट से 07 बजकर 03 मिनट तक
रायपुर प्रातः 05 बजकर 57 मिनट से 07 बजकर 21 मिनट तक
हैदराबाद प्रातः 06 बजकर 09 मिनट से 07 बजकर 31 मिनट तक
बेंगलूरु प्रातः 06 बजकर 12 मिनट से 07 बजकर 32 मिनट तक
नागपुर प्रातः 06 बजकर 07 मिनट से 07 बजकर 31 मिनट तक
अहमदाबाद प्रातः 06 बजकर 34 मिनट से 07 बजकर 58 मिनट तक
भोपाल प्रातः 06 बजकर 14 मिनट से 07 बजकर 38 मिनट तक
व्यक्ति शक्ति पीठों के दर्शन के लिये नहीं जा पाते है, उन्हें घर में ही इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर लेना चाहिए. सामान्य दिनों में भी कई लोग इसका पाठ कर मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं. ब्रह्म देव को पिता स्वरुप माना गया है. सभी देवों में उन्हें अधिक महत्व दिया गया है. परन्तु शक्ति पूजा को ब्रह्मा से भी श्रेष्ठतर माना गया है. वह सृष्टि के निर्माण, पालन या संहार का कारण नहीं है. यह सब ब्रह्म की शक्ति द्वारा ही संपन्न होता है. इसीलिए शक्ति पीठ सदा भक्तों से भरे रहते है.
प० राजेश कुमार शर्मा भृगु ज्योतिष अनुसन्धान केन्द्र सदर गजं बाजार मेरठ कैन्ट 09359109683

नवरात्र 28 सितम्बर से 05 अक्टूबर, 2011 तक

शारदीय नवरात्र 28 सितम्बर से 05 अक्टूबर, 2011 तक रहेंगे। 28 सितम्बर, बुधवार के दिन हस्त नक्षत्र 13.38 तक है। तत्पश्चात चित्रा प्रारम्भ होगा, जो घटस्थापना में वर्जित माना जाता है। बुधवार होने के कारण अभिजित भी वर्जित है। इसलिए इस दिन घटस्थापना सूर्योदय के पश्चात द्विस्वभाव लग्न कन्या में ही करना श्रेष्ठ है।
इनके दर्शन मात्र से सभी अभीष्ट पूरे होते है. शक्ति के महत्व के कारण ही भारत में अनेक शक्तिपीठ हैं. शक्तिपीठों की संख्या के संबंध में भिन्न-भिन्न मत हैं, लेकिन 'तंत्रचूड़ामणि' ग्रंथ के अनुसार, ऐसे 51 शक्तिपीठ हैं. इनमें कुछ प्रमुख के नाम हैं-ज्वालामुखी, कामाख्या, त्रिपुरसुंदरी, वाराही, काली, अंबिका, भ्रामरी, ललिता आदि।
घटस्थापना मुहूर्त मेरठ प्रातः 06 बजकर 16 मिनट से 07 बजकर 44 तक
नई दिल्ली प्रातः 06
बजकर 16 मिनट से 07 बजकर 44 मिनट तक
मुंबई प्रातः 06 बजकर 32 मिनट से 07 बजकर 54 मिनट तक

कोलकाता प्रातः 05 बजकर 30 मिनट से 06 बजकर 56 मिनट तक

चेन्नाई प्रातः 06 बजकर 01 मिनट से 07 बजकर 20 मिनट तक

जयपुर प्रातः 06 बजकर 21 मिनट से 07 बजकर 48 मिनट तक

जाधपुर
प्रातः 06 बजकर 32 से मिनट 07 बजकर 59 मिनट तक

चण्डीगढ़ प्रातः 06 बजकर 18 से मिनट 07 बजकर 48 मिनट तक

लखनऊ प्रातः 06 बजकर 01 से मिनट 07 बजकर 28 मिनट तक

वाराणसी प्रातः 05 बजकर 52 से मिनट 07 बजकर 18 मिनट तक

पटना प्रातः 05 बजकर 43 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तक
गुवाहाटी प्रातः 05 बजकर 17 मिनट से 06 बजकर 44 मिनट तक

भुवनेश्वर प्रातः 06 बजकर 40 मिनट से 07 बजकर 03 मिनट तक

रायपुर प्रातः 05 बजकर 57 मिनट से 07 बजकर 21 मिनट तक

हैदराबाद प्रातः 06 बजकर 09 मिनट से 07 बजकर 31 मिनट तक

बेंगलूरु प्रातः 06 बजकर 12 मिनट से 07 बजकर 32 मिनट तक

नागपुर प्रातः 06 बजकर 07 मिनट से 07 बजकर 31 मिनट तक

अहमदाबाद प्रातः 06 बजकर 34 मिनट से 07 बजकर 58 मिनट तक

भोपाल प्रातः 06 बजकर 14 मिनट से 07 बजकर 38 मिनट तक
व्यक्ति शक्ति पीठों के दर्शन के लिये नहीं जा पाते है, उन्हें घर में ही इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ कर लेना चाहिए. सामान्य दिनों में भी कई लोग इसका पाठ कर मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं. ब्रह्म देव को पिता स्वरुप माना गया है. सभी देवों में उन्हें अधिक महत्व दिया गया है. परन्तु शक्ति पूजा को ब्रह्मा से भी श्रेष्ठतर माना गया है. वह सृष्टि के निर्माण, पालन या संहार का कारण नहीं है. यह सब ब्रह्म की शक्ति द्वारा ही संपन्न होता है. इसीलिए शक्ति पीठ सदा भक्तों से भरे रहते है.
प० राजेश कुमार शर्मा भृगु ज्योतिष अनुसन्धान केन्द्र सदर गजं बाजार मेरठ कैन्ट 09359109683